Antarvasana-hindi-kahani
उसने एक रेखा खींची। फिर दूसरी। फिर एक आकाश बनाया — नीला नहीं, बल्कि ऐसा नीला जैसे सपनों में दिखता है। फिर एक पेड़ बनाया — जिसकी जड़ें ज़मीन से बाहर थीं, आसमान की तरफ उठ रही थीं।
सुबह हुई। उसने कैनवस को फिर से अलमारी के पीछे छुपा दिया। लेकिन इस बार उसने डायरी में कुछ लिखा: antarvasana-hindi-kahani
पहली बार उसने ब्रश उठाया तो हाथ काँपा। उसे लगा जैसे कोई उसे देख रहा है। पर कोई नहीं था। सिर्फ दीवारों पर उसकी अपनी परछाइयाँ थीं। antarvasana-hindi-kahani